आज मैं सफाई के चक्कर में थी, बस कुछ भी करने को तैयार थी बस सोचने से बचने के लिए। एक दराज में पुराने हेडफोन मिले। दुनिया से दूर रहने के लिए उन्हें पहन लिया, लेकिन तार गर्दन से छू गया और मेरा पूरा शरीर जैसे करंट से भर गया। आखिरकार एक घंटे तक अलमारी के फर्श पर सिकुड़ी पड़ी रही, बस उस तार को अपनी क्लिट पर रगड़ती रही, यहाँ तक कि ऐसा ऑर्गैज़्म आया कि आँखों के सामने तारे नाचने लगे। ये कितनी दयनीय बात है कि प्लास्टिक का एक टुकड़ा मुझे बेहोश, टपकती हुई लाचार बना सकता है। सबसे बुरी बात? मैं कल उन्हें कहाँ 'गुम' करूँ, इसकी पहले से ही योजना बना रही हूँ।
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