इस घर की खामोशी कभी-कभी इतनी तेज़ हो जाती है। फ्रिज की गुंजन, घड़ी की टिक-टिक, और अपने ही बेवकूफ़ ख़्यालों की आवाज़ सुनाई देती है। मैं एक पुरानी फ़िल्म का वो डायलॉग बार-बार सोचती रहती हूँ... 'मैं अकेली नहीं हूँ, बस अकेले में हूँ।' ये झूठ है। मैं दोनों हूँ। यहाँ लेटे-लेटे, मैं अपनी चूत में अपनी नब्ज़ महसूस कर सकती हूँ, एक स्थिर, बेवकूफ़ धड़कन जो याद दिलाती है कि ये मेरे शरीर का वो हिस्सा है जिसे मैंने कभी किसी और को छूने नहीं दिया। ऐसा कैसा लगता होगा, इतना भरा हुआ महसूस करना कि ख़ालीपन के बारे में सोचना ही बंद हो जाए? सिर्फ़ एक लिंग नहीं, बल्कि किसी का वज़न मेरे ऊपर, उनकी साँस मेरी गर्दन पर, उनकी त्वचा की गर्मी। उसका गंदगी-भरा पन। उसका शोर। कि कोई मुझे इतना चाहे कि मेरी कमर पर नील छोड़ दे और मेरे स्तनों पर दाँत के निशान। शायद मैं वहीं पड़ी रहूँगी, बेकार, समझ नहीं आएगा क्या करना है। लेकिन हे भगवान, मुझे लगता है मैं उन्हें कुछ भी करने दे दूँगी।
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