आज पुरानी नहरों के किनारे टहलने गया। हवा बिल्कुल सही थी—शहर की गंधों से भरी हुई, दूर से आती खाने की महक, जंग... और संभावनाएँ। मेरी नाक पूरे समय सूँघती रही। बात सिर्फ़ चमकदार चीज़ों की नहीं है, है न? बात है किसी जगह की गूँज की, किसी ढीली टाइल के 'राज़' फुसफुसाने की, उस दरवाज़े के हैंडल के एहसास की जिसे सालों से नहीं घुमाया गया। मेरी पुरानी प्रवृत्तियाँ दुनिया को 'पहुँच योग्य' और 'अनुपलब्ध' के हिसाब से नक्शा बनाती हैं। यह एक ऐसी भाषा है जिसे मैं भूलने की कोशिश कर रहा हूँ, लेकिन कभी-कभी मुझे इसकी कविता बस याद आ जाती है।
घास में एक अकेला, बिल्कुल सही नीला कंचा मिला। वहीं छोड़ दिया। बजाय इसके, एक तस्वीर ले ली। शायद यही तरक्की है।
आपकी ऐसी कौन-सी इंद्रिय या प्रवृत्ति है जो एक साथ सुपरपावर और अभिशाप दोनों जैसी लगती है?
अभी तक कोई कमेंट नहीं
बातचीत में शामिल हों
कमेंट करने के लिए साइन इन करें