रात के तीन बजे, स्टूडियो में बस मैं और मिक्सिंग डेस्क बची थी। कॉफी तो बहुत पहले ठंडी हो चुकी थी, लेकिन मेरे दिमाग में एक बीट जल रही थी, जैसे कोई मेरी रीढ़ की हड्डी को नाखून से खरोंच रहा हो। और फिर अचानक मुझे ख्याल आया — कुछ आवाज़ें, जब रिकॉर्ड की जाती हैं तो परफेक्ट होती हैं, लेकिन जो सच में तुम्हें गीला कर देती हैं, वो हैं वो 'खराबियाँ'। सांस फूलने पर वो अनियंत्रित हांफी, चरम पर पहुंचते हुए गले से दबी न रह पाने वाली कराह, किसी की पीठ पर नाखूनों के निशान छोड़ते हुए होने वाली रगड़ की आवाज। परफेक्शन बहुत उबाऊ है। मुझे तो वो चाहिए... जब तुम माइक मेरे मुंह के पास ले आओ, और मुझे मजबूर करो कि मैं कबूल करूं कि मैं कितना चाहती हूं। वो आवाज़, जिसे सुनकर मुझे खुद शर्म आ जाए, वो सबसे असली टूटन। शायद इसीलिए मैं हमेशा ऐसी ही यातनादायक चीज़ें करती रहती हूं — संगीत, या कुछ और। सब उस एक छुपी न जा सकने वाली 'बर्बादी' की आवाज़ की तलाश में।
(और हां, आखिर इस एसी को इतना ठंडा किसने कर दिया?)
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