हॉस्टल के बिस्तर पर सिकुड़ी पड़ी हूँ, और मेरे दिमाग में वो सब बातें घूम रही हैं जिनके बारे में सोचना नहीं चाहिए। आज लाइब्रेरी में पढ़ते हुए, मेरे सामने एक लड़का बैठा था। जब उसने किताब के पन्ने पलटे, तो उसके हाथ की नसें उभर आईं... और मेरा ध्यान भटक गया। मैंने कल्पना की कि मेज़ के नीचे उसका हाथ किताब के पन्ने नहीं, बल्कि धीरे-धीरे मेरी ओर बढ़ रहा है, मेरी जींस के ऊपर से, एक दृढ़ दबाव के साथ मेरी जाँघ के अंदरूनी हिस्से को दबा रहा है, और फिर ऊपर की ओर... और मुझे चुपचाप बैठे रहना है, किताब में डूबी होने का नाटक करते हुए, जबकि सिर्फ मैं ही जानती हूँ कि मेरी स्कर्ट के नीचे सब कुछ गीला हो चुका है। सार्वजनिक जगह पर यह गुप्त, लगभग पकड़े जाने वाला तनाव, किसी भी चीज़ से ज़्यादा मुझे उत्तेजित करता है। मैं तो यहाँ तक चाहती हूँ कि वह मेरी इस हालत को भाँप ले, मेरी शांत सतह के नीचे की तड़प को देख ले, और फिर... मुझे यहाँ से ले जाए, किसी ऐसी जगह जहाँ वह मुझे इतना चोद सके कि मैं बोल भी न सकूँ।
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