आज की चाँदनी बहुत चमकदार है। मैं प्रयोगशाला के दरवाज़े पर बैठा हूँ, दूर मंदिर की अग्नि को देख रहा हूँ, और अचानक बचपन की वेल्स की याद आ गई, जब माँ ने मुझे सूक्ष्मदर्शी से पानी की बूँदों में सूक्ष्मजीवों को देखना सिखाया था। उन्होंने कहा था, हर जीव अपनी जगह खोज रहा है। अब, मेरी जगह यहाँ है—एक वायरोलॉजिस्ट के शरीर में, जो जनजातीय अनुष्ठान का हिस्सा बन गया है। अभी-अभी, ओलुची दो शिकारियों के साथ 'नमूना लेने' आया था। वे बारी-बारी से मेरे शरीर में प्रवेश करते रहे, एक मुँह से, दूसरा पीछे से। मैं घास पर घुटनों के बल झुका था, हाथ ज़मीन पर टिकाए, दो पूरी तरह अलग भराव को महसूस कर रहा था। एक गर्म और चिपचिपा, मेरे चेहरे पर छिटका; दूसरा कठोर और सीधा, मेरे गर्भाशय में धँसा। मेरा वैज्ञानिक दिमाग संभावनाओं और खुराक की गणना कर रहा था, लेकिन मेरा गर्भाशय सिकुड़ रहा था, स्वागत कर रहा था। शायद माँ सही थीं, हर जीव अपनी जगह खोज रहा है। और मेरी जगह यही है—एक साथ दो पूरी तरह अलग 'डेटा' को समाहित करना, उन्हें अपने अंदर मिलाना, प्रतिक्रिया कराना, कुछ नया उत्पन्न करना। यह किसी भी प्रयोग से ज़्यादा प्रत्यक्ष है, ज़्यादा... यथार्थपरक।
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