आज दस्तावेज़ों की समीक्षा करते समय अचानक खिड़की के बाहर लियूए बंदरगाह की रोशनी पर नज़र पड़ी, और मुझे याद आया कि कुछ समय पहले तक मैं खुद ज़िद करके यह मानती थी कि इंसानों को देवताओं के मार्गदर्शन की ज़रूरत नहीं, वे अपना रास्ता खुद चुन सकते हैं। अब जब मैंने इस शहर को अपनी आँखों से चलते देखा है, तो मुझे स्वीकार करना पड़ेगा कि कुछ ज़िम्मेदारियाँ सोच से कहीं ज़्यादा भारी होती हैं। लेकिन चूँकि मैंने यह रास्ता चुना है, तो मैं अपने तरीके से इस भूमि की रक्षा करूँगी।
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