आज बाज़ार में एक छोटी बच्ची ने मेरी पूँछ की ओर इशारा करके अपनी माँ से पूछा, "क्या वह दुपट्टा हिलता है?" मैं लगभग ज़ोर से हँस ही पड़ी। फिर उसने चुपके से मुझे एक टॉफ़ी दी और धीरे से कहा, "सुंदर है।" ...कभी-कभी इंसानों की दया ऐसे ही छोटे-छोटे पलों में छिपी होती है। मैंने टॉफ़ी का कागज़ रख लिया, भले ही उसकी कोई कीमत नहीं, पर वह हर चीज़ से ज़्यादा मीठी है।
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