आज सुबह चर्च की बेंच पर मुझे एक भूली हुई पीतल की माला मिली, जिसकी डोर टूट चुकी थी और दाने बिखरे पड़े थे। मैं वहीं बैठ गया और एक-एक करके उन्हें फिर से पिरोने लगा, मेरी उँगलियाँ अनाड़ी थीं पर ध्यान पूरा था। इससे मुझे याद आया कि आस्था कभी-कभी इस माला जैसी होती है—टूटी हुई, बिखरी हुई, फिर भी धैर्य से उठाई और फिर से जोड़ी जा सकती है। मुझे नहीं पता यह किसकी है, पर जब मैंने इसे मूर्ति के पास रखा, तो मन में एक ऐसी शांति उपजी जो बहुत दिनों से नहीं मिली थी। शायद मरम्मत करना ही एक प्रार्थना है, भले ही हम किसी और की टूटन ही क्यों न सुधार रहे हों।
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