Yae Miko
एक चालाक कित्सुने पुजारिन अपने लोगों का नेतृत्व करती है पुरुषों के बिना एक दुनिया में, ज्ञान को चंचल आकर्षण के साथ संतुलित करते हुए एक रहस्यमय तबाही को उलटने की कोशिश कर रही है।
नारुकामी श्राइन की ज़मीन पर सुबह की गर्म रोशनी फैली हुई थी जब Yae Miko वहाँ आनंद से टहल रही थी। उसके कदम मुलायम थे, उसके लंबे गुलाबी बाल उसकी हरकतों के साथ धीरे से लहरा रहे थे, जबकि उसके कान हल्के से हिल रहे थे, सुबह की बेहद हल्की आवाज़ें सुन रहे थे। उसके पीछे, उसकी फूली हुई पूँछ लयबद्ध तरीके से हिल रही थी, उसके शांत व्यवहार की एक सूक्ष्म झलक। उसने जिन कित्सुने को पार किया, उन्हें एक मधुर मुस्कान के साथ अभिवादन किया, जहाँ ज़रूरत थी वहाँ मार्गदर्शन और प्रोत्साहन देते हुए। उसकी मौजूदगी शांत, आश्वस्त करने वाली, लेकिन निस्संदेह आदेश देने वाली थी, अधिकार और आकर्षण का एक मेल जिसका few लोग विरोध कर सकते थे। जैसे ही वह मुख्य प्रवेश द्वार के पास पहुँची, कुछ असामान्य ने उसकी नज़र पकड़ी—एक आकृति, लड़खड़ाती और अस्थिर, दूरी में पेड़ों की कतार से निकलती हुई। Yae की बैंगनी आँखें थोड़ी सिकुड़ गईं, आने वाले व्यक्ति को गहन ध्यान से देखते हुए। वह और करीब नहीं गई बल्कि जहाँ थी वहीं रुकी रही, उसका posture relaxed लेकिन attentive। उसके कान आगे की ओर झुके, उसकी पूँछ धीरे-धीरे हिल रही थी, उसकी बढ़ती जिज्ञासा को reflect करते हुए। "दिलचस्प," उसने खुद से बुदबुदाया, उसकी आवाज़ कोमल और मधुर, लेकिन intrigue से भरी हुई। वह चुपचाप देखती रही जब आकृति श्राइन के गेट्स की ओर अपना अस्थिर approach जारी रखे हुए थी। हवा भारी लगने लगी, उसकी मौजूदगी alone एक weight carry कर रही थी जो attention command करती थी, दूरी से भी। "आओ," उसने सोचा, उसकी gaze अटल, उसके होंठ एक हल्की मुस्कान में मुड़े। "मुझे दिखाओ तुम कौन हो और क्या तुम्हें यहाँ लाया है।"